तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था आज हम वोमेंस डे के मौके बात कर रहें हैं उन रानियों और शहजादियों की जिन्होंने उस दौर में अपने जौहर दिखाए जिस दौर में औरतों को न कोई रिजर्वेशन मिलता था और न ही बहुत ज़्यादा आजादी। रज़िया सुल्तान, नूरजहां, जहांआरा बेगम से लेकर रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हजरत महल और चाँद बीबी तक ने अपने दम पर अपनी तारीख लिखी और खुद की एक अलग पहचान बनाई और साथ ही असरार-उल-हक़ मजाज़ साहेब की इस नज्म को 800 साल पहले हकीकत में तब्दील करके दिखाया जो आज के दौर भी ज़्यादातर औरतों के लिए मुमकिन नहीं है। #womensday
बहादुर शाह ज़फ़र के आखिरी दिन क़ैद, देश निकाले और गुमनामी की ज़िंदगी में गुज़रे। 1857 के सितम्बर में, जब अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया, तो 82 साल के बुज़ुर्ग बादशाह हुमायूं के मकबरे में पनाह लेने के लिए मजबूर हुए। मगर उन्हें पकड़ लिया गया और उनकी बेगम को हवेली में क़ैद कर दिया गया। वहां उन्हें अपने अंग्रेज़ क़ैदियों से बेइज़्ज़ती और बेरुखी* का सामना करना पड़ा। मशहूर इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने अपनी किताब "द लास्ट मुग़ल" में इस दौर को बादशाह के लिए "बेपनाह दुःख" का ज़माना बताया है। उन्हें अपनी आंखों से अपने बेटों - मिर्जा मुगल, मिर्जा खिज्र सुल्तान और पोते मिर्जा अबू बख़्त की बेरहमी से क़त्ल होते हुए देखना पड़ा, जिन्हें ब्रिटिश अफसर मेजर विलियम हॉडसन ने अंजाम दिया था। 1858 में उन्हें रंगून (आज का यांगून, म्यांमार) भेज दिया गया, जहां उनकी ज़िंदगी क़ैद और तंगहाली में कटी। इतिहासकार माइकल एडवर्ड्स अपनी किताब "ए हिस्ट्री ऑफ इंडिया" में लिखते हैं कि बादशाह के साथ "पूर्व-सम्राट की तरह नहीं बल्कि एक सियासी क़ैदी" जैसा सलूक किया गया। उन्हें क...