22 फरवरी यौमे वफात
आज़ाद द लीडर - मौलाना अबुल कलाम आजाद रहमतुल्लाह अलयही
वो दिल्ली के एक बड़े पीर के बेटा थे। तसव्वुफ़ के बड़े आलिम थे; जिनकी क़दर तुर्की का सुल्तान यानी मुसलमानो ख़लीफ़ा भी किया करते थे। 1857 के क़त्ल ओ ग़ारत के बाद वो इस्तांबुल गए, फिर वहाँ से हेजाज़ गए, वहीं शादी की और वहीं पर ग़ुलाम मोहिउद्दीन अहमद का मक्का में 1888 में जन्म हुआ। दो साल बाद ये लोग कलकत्ता यानी भारत की राजधानी आ गए। कलकत्ता में ग़ुलाम मोहिउद्दीन को पढ़ाने का बेड़ा ख़ुद उनके वालिद ने उठाया। फिर उन्हें पढ़ाने के लिए मौलवी मुहम्मद याक़ूब (र.अ.), मौलवी नज़ीरउल हसन (र.अ.)
, रंजूर अज़ीमाबादी मौलवी मुहम्मद इब्राहीम, मौलाना सआदत हुसैन क़ाबिल, मौलवी मुहम्मद उमर और शौक़ नीमवी (र.अ.)जैसे बड़े स्कॉलर घर पर बुलाये गए। ग़ुलाम मोहिउद्दीन ने अरबी के साथ उर्दू, हिंदी, इंगलिश और बंगला सीखा।
उन्होंने 12 साल की उमर में अल मिसबाह नाम के अख़बार का इडिटर बन कर जो काम किया, उससे भारत के बड़े बड़े स्कॉलर हैरतज़दा थे। उन्होंने सैंकड़ों लेख लिखे। तख़ल्लुस यानी पेननेम “आज़ाद” रखा। ये ग़ुलाम मोहिउद्दीन अहमद कोई और नही मौलाना अबुल कलाम आज़ाद हैं।
नदवा तुल उलमा जैसी संस्था को मात्र 16 साल की उम्र में अपनी सेवाएँ दी। 18 साल की उम्र में अमृतसर से निकलने वाले वकील अख़बार का एडिटर का पद सम्भाला। फिर दुनिया के अलग अलग मुल्क का दौरा किया। फिर वापस आकर अनुशीलन समिति जैसे कट्टर हिंदू संगठन के साथ मिल कर क्रांतिकारी गतिविधियों में लग गए, उसी पैटर्न पर हिज़्बुल्लाह नामक संगठन तैयार किया जिसने 1700 लोग जुड़े थे। अरबिंदो से अपनी दोस्ती बढ़ाई। हिंदू मुस्लिम एकता पर ज़ोर दिया। हर सीआईडी रिपोर्ट में नाम आने लगा। अंग्रेज़ों ने ये इल्ज़ाम लगाया के ये अरबिंदो के गुरुकुल के पैटर्न पर शिक्षण संस्थान खोल कर लोगों को ट्रेनिंग देने का काम करते हैं।
अपने काम को आगे बढ़ाते हुए 1912 में अलहेलाल अख़बार निकाला, इसने क्रांति ला दी, अंग्रेज़ घबरा गए और पाबंदी लगा दी, तो अल बलाग़ निकाला। 1913 में जमियत उलमा ए बंगला बनाने में अहम रोल अदा किया। सीआईडी ने रेशमी रूमाल तहरीक का मास्टरमाइंड बताया। 1916 में अल बलाग़ पर पाबंदी लगा दी और यूपी, बंबई, पंजाब और दिल्ली प्रांत की सरकार ने वहाँ घुसने पर पाबंदी लगा दी। तब मौलाना आज़ाद सालों तक राँची में नज़रबंद रहे, इसी नज़रबंदी के दौरान एक मदरसा इस्लामिया 1917 में खोला और एक संगठन अंजुमन इस्लामिया बनाया। यहाँ एक मस्जिद में जुमा का खुतबा दिया करते, जिसे सुनने वालों में मुसलमान के साथ बड़ी संख्या में हिंदु होते थे। नज़रबंदी हटी तो पटना में इमारत ए शरिया की बुनियाद डालने में अहम रोल अदा किया।
रोल्लेट ऐक्ट के विरोधी तो थे ही, ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन में लीडर की भूमिका निभाई। जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में अपना भरपूर योगदान दिया। 1921 में पैग़ाम नाम का एक अख़बार निकाला, जिस पर पाबंदी लगी और उन्हें एक साल की क़ैद हुई। अदालत में उनका जो बयान है, वो अपने इतिहास एक बाब है, जो आज भी किताबी शकल में क़ौल ए फ़ैसल के रूप में महफ़ूज़ है।
मात्र 35 साल की उम्र में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और अपने दम पर स्वराज पार्टी और कांग्रेस को वापस एक किया। और नागपुर के सत्याग्रह को लीड किया। नेहरू रिपोर्ट का समर्थन किया जिसका बहुत से मुस्लिम नेता विरोध कर रहे थे। मुस्लिम लीग के समानांतर एक मुस्लिम पार्टी मजलिस ए अहरार बनाने में अहम रोल अदा किया। नमक सत्याग्रह में सबसे अहम रोल अदा किया और 1930 से 1934 तक जेल में रहे।
1937 में हुए विभिन्न चुनाव में कांग्रेस की जीत में अहम रोल अदा किया। 1940 में जब मुस्लिम लीग ने अलग देश की माँग की तो रामगढ़ में कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से सबसे अधिक विरोध किया। भारत छोड़ो आंदोलन का ख़ाका बनाया और कांग्रेस अध्यक्ष की हैसयत से पूरे भारत का दौरा कर ज़मीनी स्तर पर पार्टी के लोगों से मीटिंग की और उन्ही की सरपरस्ती में अगस्त 1942 में आंदोलन मुंबई से शुरू हुआ। ये भारत के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन साबित हुआ। इस वजह कर लम्बे समय तक जेल में रहे। नेताजी सुभाष चंद्रा बोस ने अपनी आज़ाद हिंद फ़ौज के एक रेजिमेंट का नाम इन्ही के नाम पर आज़ाद रेजिमेंट रखा।
जब गांधी जी ने 1944 में मुंबई में जिन्ना से बात चीत शुरू की तो मौलाना आज़ाद ने बहुत मुख़ालफ़त की। 1946 में जेल से बाहर आने के कांग्रेस को भारतीय संविधान सभा में लीड किया, जहां भारत का नया संविधान बनना था। जिन्ना के डाइरेक्ट ऐक्शन डे की खुली मुख़ालिफ़त की।
बहरहाल भारत के बँटवारे का मौलाना आज़ाद ने बहुत विरोध किया, जिस हद तक कर सकते थे विरोध किया। लेकिन बँटवारा हुआ, भारत और पाकिस्तान अलग वजूद में आ गया। *आज़ाद भारत में मौलाना आज़ाद शिक्षा मंत्री बने तो University Education Commission और Secondary Education Commission बहाल कर पूरे भारत में स्कूल और कॉलेज का जाल बिछा दिया। भारत के अधिकतर सरकारी कॉलेज इन्ही के दौर में बने। फ़्री प्राइमरी स्कूल को नया रूप दिया, बच्चों के लिए तालीम कंपलसरी की। लड़कियों और ग़रीब बच्चों के लिए अलग स्कीम निकाला ताकि वो पढ़ सकें। उनके तालीम के लिए भरपूर कोशिश की। जवान लोगों के पढ़ाई का भी इंतज़ाम किया। गाँव के लोगों के लिए अलग स्कीम के तहत National Council of Rural Education की बुनियाद डाली। साथ ही Central Social Welfare Board डाली। अलग अलग राज्य के शिक्षा मंत्री के साथ वन टू वन मीटिंग कर उनसे सारा लेखा जोखा लेते। *इसके इलावा आईआईटी और यूजीसी की बुनियाद डाली, कई टेकनिकल इन्स्टिटूट खोलवाए। ICCR की बुनियाद डाली। IISc को उसके उरूज पर पहुँचाया। AICTE को मान्यता दी। ICSE की बुनियाद डाली। National Gallery of Modern Art बनवाया, संगीत नाटक अकेडमी, साहित्य अकेडमी, ललित कला अकेडमी उन्ही की देन है।* संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए एक कमीशन की बुनियाद डाली। National Archive और National Library के उत्थान के लिए भरपूर कोशिश की। साथ में Indian National Commission for Cooperation with UNESCO की बुनियाद डाली।
मौलाना आज़ाद की ख़ूबी यह थी के वो जहां रहे वहाँ उन्होंने एक राष्ट्रवादी संस्था की बुनियाद डाली, कलकत्ता, राँची, पटना, लखनऊ, दिल्ली जैसे शहरों में उन्होंने आज़ादी से पहले ही कई संस्थान खुलवाए, और *जब भारत के शिक्षा मंत्री हुए तो पूरे भारत में शिक्षण संस्थान को स्थापित किया। मौलाना आज़ाद एक डाइनेमिक आदमी थे। दुनिया घूमा था, अलग अलग समुदाय के बीच रहे, उनसे डायलोग किया। दर्जन भर भाषा के ज्ञानी थे, लोगों को समझते थे, इसलिए उन्होंने भारत को जो दिया, उससे आगे भारत आज भी नही बढ़ पाया है, *मौलाना आज़ाद के ब्रेनचाइल्ड आईआईटी, आईआईएम और यूजीसी* को ही हमने अपना ब्रांड बना रखा है।
*मौलाना आज़ाद जब मुसलमानो के नेता थे, तब उन्होंने मुसलमानो के लिए भरपूर काम किया। जब मौलाना आज़ाद कांग्रेस के नेता हुए, तब उन्होंने कांग्रेस के लिए बहुत काम किया। और जब भारत के शिक्षा मंत्री हुए तो भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए जो काम किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण अब तक भारत के इतिहास नही मिलता है।* बाक़ी अगर किसी को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की लीडरशिप पर शक है तो उसे बस एक उदाहरण दे देता हूँ ~
1957 में जब दूसरी बार राष्ट्रपति के चुनाव की बारी आई तब जवाहर लाल नेहरू ने ये बात उठाई के कोई भी इंसान दूसरी बार भारत का राष्ट्रपति नही बन सकता है। इस तरह से डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का दूसरी बार भारत का राष्ट्रपति बनना तक़रीबन नामुमकिन हो गया था, क्यूँकि उस समय जवाहर लाल नेहरू की बात को कोई काट नही सकता था।
इन्ही सब चीज़ को लेकर एक मीटिंग चल रही थी, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी थे। जब ये बात वापस वहाँ पर उठी तब मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने बड़ी ही बेबाकी के साथ कहा के सिर्फ़ राष्ट्रपति के लिए ही क्यूँ ?? ये बात प्रधानमंत्री के लिए भी लागू होनी चाहिए के एक आदमी दो बार प्रधानमंत्री नही बन सकता है।
मीटिंग में मौजूद सारे लोग दंग रह गए, जवाहर लाल नेहरु को भी अपनी कुर्सी ख़तरे में दिखने लगी, इसलिए उन्होंने इस मुद्दे को धीरे धीरे ख़त्म किया और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद वापस भारत के राष्ट्रपति बने।
(तस्वीर में मध्यप्रदेश के शिक्षा मंत्री शंकर दयाल शर्मा भारत शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के साथ)
- heritage times
संकलन अताउल्लाखा पठाण सर
टूनकी,संग्रामपूर, बुलढाणा

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